चैत्र नवरात्र पूजा - Chaitra Navratri Puja

चैत्र नवरात्रि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होती है और नवमी तिथि तक मनाई जाती है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि २८ मार्च (मंगलवार), २०१७ से प्रारम्भ हो ५ अप्रैल (बुधवार), २०१७ तक है। इन नौ दिनों को देवी दुर्गा की पूजा अर्चना की जाती है।
इसमें प्रथम तिथि को कलश-स्थापना के साथ देवी दुर्गा की पूजा प्रारम्भ की जाती है। इसे वसंत नवरात्रि भी कहते हैं। इसमें नौ दिनों तक पूरे विधि-विधान से देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। भक्तगण दुर्गा-चालीसा,दुर्गा-सप्तशती इत्यादि का नौ दिनों तक पाठ करते हैं। इसमें देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों का पूजन किया जाता है। प्रथम या प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना की जाती है।नवरात्रि के अष्टमी और नवमी तिथि को कन्या पूजन किया जाता है। नवमी को हवन करने के बाद चैत्र नवरात्रि सम्पन्न होता है। अगले दिन यानी दशमी तिथि को विसर्जन किया जाता है। कुछ भक्तगण चैत्र नवरात्रि में रामचरितमानस का भी पाठ करते हैं। चैत्र नवरात्रि के दिन रामनवमी मनायी जाती है, चैत्र नवरात्रि को ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी का जन्म हुआ था।अत: चैत्र शुक्ल पक्ष के नवमी को रामनवमी भी कहा जाता है। इस तिथि को सभी जगह श्रीराम जी की पूजा अर्चना की जाती है।

कलश स्थापना सामग्री:-

• जौ/सप्त धान्य बोने के लिये मिट्टी का पात्र, • जौ/सप्त धान्य बोने के लिये मिट्टी, • जौ/सप्त धान्य बोने के लिये जौ, • मिट्टी का कलश, • शुद्ध जल/ गंगाजल, • मौली/ लाल कपड़ा, • इत्र, • साबुत सुपारी, • सिक्के, • आम के पत्ते, • कलश का ढ़क्कन , • अक्षत, • पानी वाला नारियल, • नारियल के लिये लाल कपड़ा, • फूल- माला, • दीपक, • घी, •दुर्वा, • सप्तधान्य- जौ,मूंग,• धान, •तिल, •चना, • कंगनी(साबुत), • गाँठ वाली साबुत हल्दी

पूजन सामग्री:-

• चौकी या लकड़ी का पटरा, • लाल कपड़ा- 2, • धूप, • दीप, • अक्षत, • चंदन, • घी, • लाल पुष्प, • पुष्पामाला, • रोली, नैवेद्य, • साबुत सुपारी, • लौंग, • इलायची, • सुपारी( टुकड़े किये हुये), • पान के पत्ते- ५, • गुड़, • खुले सिक्के, • कपूर, • लाल आसन, •आरती के लिये थाली, • नैवेद्य के लिये पात्र या थाली, • लोटा, • चम्मच/ आचमनी

चैत्र नवरात्र पूजा विधि - Chaitra Navratri Puja Vidhi

साधक प्रात:काल उठकर सभी कार्यों से निवृत हो स्नान कर शुद्ध-स्वच्छ वस्त्र धारण कर ले। पूजा-गृह को साफ और शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर लाल आसन पर बैठ जाये। चौकी या लकड़ी के पटरे को पूजा स्थान पर रखे। उसपर लाल कपड़ा बिछाये। चौकी पर दुर्गा माँ की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
पवित्रीकरण- हाथ में जल लेकर मंत्र पढ़ते हुए स्वयं पर तथा सभी पूजन सामग्री पर जल छिड़क दें ।
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
आसन शुद्धि इसके बाद आसन को भी जल छिड़क कर निम्नलिखित मंत्र से शुद्ध कर लें:-
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
पृथ्वी पूजन- अब मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
आचमन- फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
पवित्री धारण तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, कुश की पवित्री धारण करें-
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः ।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।
संकल्प हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे चैत्रमासे शुक्लपक्षे प्रतिपदातिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्‌््यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थ- काममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा दुर्गापूजा/चैत्र नवरात्रि किरष्ये/करिष्यामि।
गणेश पूजा:- इसके बाद चौकी पर /किसी पात्र में चावल का ढेर रखकर , उसपर गणेश जी की मूर्ति (यदि मूर्ति ना हो तो सुपारी पर मौली लपेट कर गणेश जी के रूप में रखें) स्थापित करें। अब पंचोपचार विधि से गणेश जी की पूजा करें।धूप,दीप, अक्षत,चंदन/सिंदूर एवं नैवेद्य समर्पित करते हुये गणेश जी की पूजा करें।

कलश- स्थापना विधि:-
१.पात्र मे मिट्टी तथा जौ/सप्त धान्य:- निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये मिट्टी के पात्र में मिट्टी तथा जौ/सप्त धान्य डालें।सबसे पहले मिट्टी, उसके ऊपर जौ/सप्त धान्य, मित्टी का दूसरा परत, उसके ऊपर जौ/सप्त धान्य ।उसके बाद मिट्टी से पात्र को अच्छी तरह भर दें।
ऊँ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणायत्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा।
दीर्घामनु- प्रसितिमायुषे द्यां देवो व: सविता हिरण्य-पाणि:।
प्रति-गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥ इसके बाद साधक अपने बायीं ओर सामने मिट्टी का पात्र(जौ /सप्तधान्य और मिट्टी से भरा हुआ) रखें।
२. मिट्टी के पात्र के ऊपर कलश रखते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दव:।
पुनरुर्ज्जा निवर्तस्व सा न: सहस्त्रं धुक्ष्वोरु- धारा पयस्वती पुनर्मा विशताद् रयि:॥
३. कलश मे शुद्ध जल (गंगा जल मिलाया हुआ) डालें एवं निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ-सर्ज्जनीस्थो।
वरुणस्य ऋत- सदन्यसि वरुणस्य ऋत- सदनमसि वरुणस्य ऋत –सदनमासीद॥
४. कलश के गले में मौली या लाल कपड़ा बाँधते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ वसो: पवित्रमसि शत- धारं वसो: पवित्रमसि सहस्त्र-धारम्।
देवस्त्वा सविता पुनातु वसो: पवित्रेण शत-धारेण सुप्वा काम-धुक्ष:॥
५. कलश में साबुत सुपारी डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ या: फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:।
बृहस्पति-प्रसूतास्ता नो मुंचंत्व हस:॥
६. कलश में सिक्के डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ हिरण्य-गर्भ: सम-वर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
७. कलश में इत्र डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ गंध-द्वारां दुराधर्षां नित्य-पुष्टां करीषिणीं।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
८. कलश में साबुत हल्दी डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ या ओषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनु बभ्रूणा मह शतं धामानि सप्त च॥
९. कलश में दुर्वा डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुष: परुषस्परि।
एवानो दूर्वे! प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च॥
१०. कलश में आम का पत्ता (पाँच या सात पत्तियों वाला आम का पत्ता टहनी सहित) डालते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ अश्वत्थे वो निषदनन्पर्णे वो वसतिष्कृत।
गोभाज इत्किलासथ यत्स नवथ पूरुषम्॥
११. कलश के ऊपर अक्षत से भरा हुआ मिट्टी का पात्र रखते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:-
ऊँ पूर्णादर्वि परापत सु-पूर्णा पुनरापत ।
वस्नेव विक्रीणा वहा इष मूर्ज्ज शत-क्रतो॥
इसके बाद कलश के ऊपर लाल कपड़े में पानी वाला नारियल लपेटकर रखें।
१२. वरुण देव आवाहन मंत्र:-आवाहन मुद्रा के द्वारा निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश में वरुण देव का आवाहन करें:-
ऊँ भूर्भुव: स्व: वरुण! इहा गच्छ , इह तिष्ठं, मम पूजां गृहाण।
१३. निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ कलश का पूजन करते हुये सभी सामग्री अर्पित करें :-
ऊँ वरुणाय नम: पाद्यौ: पाद्यं समर्पयामि । (पाद्य धोने के लिये जल समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: अर्घ्यं समर्पयामि । (अर्घ्य के लिये जल समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: गंधं समर्पयामि । (गंध/इत्र समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: अक्षतं समर्पयामि । (अक्षत समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: पुष्पं समर्पयामि । (फूल समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: धूपं समर्पयामि । (धूप समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: दीपं समर्पयामि ।(दीप समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: नैवेद्यं समर्पयामि ।(भोग के रूप में मिष्ठान समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: आचमनीयं समर्पयामि । (आचमन लिये जल समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: ताम्बूलं समर्पयामि ।(मुख-शुद्धि के लिये ताम्बूल/पान समर्पित करें)
ऊँ वरुणाय नम: दक्षिणां समर्पयामि ।(दक्षिणा समर्पित करें)

ध्यान :- हाथ में लाल फूल लेकर , दोनों हाथ जोड़कर माँ दुर्गा का निम्न मंत्र के द्वारा ध्यान करें:-
ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्च क्रगदासिखेटविशिखांश्चा्पं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥
फूल माता के चित्र/ मूर्ति पर अर्पित करें।
आवाहन:- दोनों हाथ जोड़कर आवाहन के मुद्रा में माँ दुर्गा का निम्न मंत्र के द्वारा आवाहन करें:-
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: आवाहनम् समर्पयामि ॥
आसन:- हाथ में पुष्प लेकर निम्न मंत्र के उच्चारण के दवारा माता को आसन समर्पित करें:-
अनेक रत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम्।
कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: आसनम् समर्पयामि ॥
पाद्य:- चम्मच में जल लेकर पाद्य धोने के लिये निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा जल समर्पित करें:‌- गंगादि सर्वतीर्थेभ्यो मया प्रार्थनायाहृतम्।
तोयमेतत्सुखस्पर्श पाद्यर्थम् प्रतिगृह्यताम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: पाद्यम् समर्पयामि ॥
अर्घ्य:- चम्मच में जल लेकर अर्घ्य के लिये निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा जल समर्पित करें:‌-
गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया।
गृहाण त्वं महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: अर्घ्यम् समर्पयामि ॥
आचमन:- चम्मच में जल लेकर आचमन के लिये निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा जल समर्पित करें:‌-
आचम्यतां त्वया देवि भक्ति मे ह्यचलां कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: आचमनीयं जलम् समर्पयामि ॥
स्नान :- चम्मच में जल लेकर स्नान के लिये निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा जल समर्पित करें:‌-
पयोदधि घृतं क्षीरं सितया च समन्वितम्।
पञ्चामृतमनेनाद्य कुरु स्नानं दयानिधि॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: स्नानीयं जलम् समर्पयामि ॥
वस्त्र :- हाथ में वस्त्र लेकर निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को वस्त्र समर्पित करें:‌-
वस्त्रं च सोम दैवत्यं लज्जायास्तु निवारणम्।
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: वस्त्रम् समर्पयामि ॥
चंदन:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा चंदन समर्पित करें:‌-
परमानन्द सौभाग्यं परिपूर्णं दिगन्तरे।
गृहाण परमं गन्धं कृपया परमेश्वरि॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: चंदनम् समर्पयामि ॥
कुमकुम:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा कुमकुम (रोली) समर्पित करें:‌-
कुंकुमं कान्तिदं दिव्यं कामिनी काम सम्भवं।
कुंकुमेनार्चिते देवि प्रसीद परमेश्वरी॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: कुंकुमम् समर्पयामि ॥
गंध:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को इत्र समर्पित करें:‌-
चन्दनागरु कर्पूरै: संयुतं कुंकुमं तथा।
कस्तूर्यादि सुगन्धाश्च सर्वांगेषु विलेपनम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: सुगन्धित द्रव्यम् समर्पयामि ॥
अक्षत:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को अक्षतसमर्पित करें:‌-
रञ्जिता: कंकुमौद्येन न अक्षताश्चातिशोभना:।
ममैषां देवि दानेन प्रसन्ना भव शोभने॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: अक्षतान् समर्पयामि ॥
पुष्प:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को पुष्प तथा पुष्पमालासमर्पित करें:‌-
मंदार पारिजातादि पाटली केतकानि च।
जाती चम्पक पुष्पाणि गृहाणेमानि शोभने॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: पुष्पम् समर्पयामि ॥
धूप:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को धूप समर्पित करें:‌-
दशांग गुग्गुल धूपं चन्दनागरु सन्युतम्।
समर्पितं मया भक्त्या महादेवि! प्रतिगृह्यताम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: धूपमाघ्रापयामि समर्पयामि ॥

दीप:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को दीप समर्पित करें:‌-
घृतवर्त्तिसमायुक्तं महातेजो महोज्ज्वलम्।
दीपं दास्यामि देवेशि! सुप्रीता भव सर्वदा॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: दीपं समर्पयामि ॥
नैवेद्य:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को भोग के लिये मिष्ठान समर्पित करें:‌-
अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसै: षड्भि: समन्वितम्।
नैवेद्य गृह्यतां देवि! भक्ति मे ह्यचला कुरु॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: नैवेद्य समर्पयामि ॥
ऋतुफल:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को ऋतुफल समर्पित करें:‌-
द्राक्षाखर्जूर कदलीफल साम्रकपित्थकम्।
नारिकेलेक्षुजम्बादि फलानि प्रतिगृह्यताम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: ऋतुफलम् समर्पयामि ॥
आचमन:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को आचमन के लिये जल समर्पित करें:‌-
कामारिवल्लभे देवि कर्वाचमनमम्बिके।
निरन्तरमहं वन्दे चरणौ तव चण्डिके॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: आचमनीयं जलं समर्पयामि ॥
ताम्बूल:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को ताम्बूल समर्पित करें:‌-
एलालवङ्गं कस्तूरी कर्पूरै: पुष्पासिताम्।
वीटिकां मुखवासार्थ समर्पयामि सुरेश्वरि॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: ताम्बूलं समर्पयामि ॥
दक्षिणा:- निम्न मंत्र के उच्चारण के द्वारा माँ दुर्गा को दक्षिणा समर्पित करें:‌-
पूजा फल समृद्धयर्थ तवाग्रे सवर्णमीश्वरी।
स्थापितं तेन मे प्रीता पूर्णान् कुरु मनोरथम्॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: दक्षिणां समर्पयामि ॥
आरती:- आरती के थाल में कर्पूर जला कर माँ दुर्गा की आरती करें:-
श्री दुर्गा जी की आरती जगजननी जय ! जय !! माँ , जगजननी जय ! जय !! माँ
भयहारिणि भवतारिणि , भवभामिनि जय जय ॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
तू ही सत-चित-सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूप ।
सत्य सनातन सुन्दर पर शिव-सुरभूपा ॥१॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर अज आनँदराशी ॥२॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
अविकारी , अघहारी , अकल , कलाधारी ।
कर्ता विधि , भर्ता हरि , हर सँहारकारी ॥३॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
तू विधिवधू , रमा , तू उमा , महामाया ।
मूल प्रकृति विद्या तू , तू जननी जाया ॥४॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
राम , कृष्ण तू , सीता , ब्रजरानी राधा ।
तू वांछाकल्पद्रूम , हारिणि सब बाधा ॥५॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
दश विद्या , नव दुर्गा , नानाशस्त्रकरा ।
अष्टमातृका , योगिनि , नव नव रूप धरा ॥६॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
तू परधामनिवासिनि , महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशानविहारिणि , ताण्डवलासिनि तू ॥७॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
सुर – मुनि - मोहिनि सौम्या तू शोभाऽऽधारा ।
विवसन विकट स्वरूपा , प्रलयमयी धारा ॥८॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
तू ही स्नेह - सुधामयी , तू अति गरलमना ।
रत्न - विभूषित तू ही , तू ही अस्थि-तना ॥९॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
मूलाधारनिवासिनि , इह-पर-सिद्धिप्रदे ।
कालातीता काली , कमला तू वरदे ॥१०॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी ।
भेदप्रदर्शिनि वाणी विमले ! वेदत्रयी ॥११॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
हम अति दीन दुखी मा ! विपत-जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी पर बालक तेरे ॥१२॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
निज स्वभाववश जननी ! दया दृष्टि किजै ।
करुणा कर करुणामयी ! चरण-शरण दीजै ॥१३॥
॥ जगजननी जय ! जय !! माँ.. ॥
प्रदक्षिणा:- अपने स्थान पर खड़े होकर तीन बार बायें से दायें घूमते हुये माँ दुर्गा की प्रदक्षिणा करें:‌-
प्रदक्षिणं त्रयं देवि प्रयत्नेन प्रकल्पितम्।
पश्याद्य पावने देवि अम्बिकायै नमोऽस्तुते॥
ऊँ श्री दुर्गाय नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि ॥
क्षमा-प्रार्थना:- दोनों हाथ जोड़कर माँ दुर्गा से क्षमा प्रार्थना करें:‌-
अपराध शतं देवि मत्कृतं च दिने दिने ।
क्षम्यतां पावनी देवि-देवेश नमोऽस्तुते॥


नवरात्रि में क्या करें:-
• देवी दुर्गा का प्रिय रंग लाल है, अत: माँ दुर्गा को लाल रंग का वस्त्र,फूल, आसन आदि अर्पित करें। स्वयं भी लाल रंग का वस्त्र धारण करें।
• नवरात्रि के नौ दिन को सुबह और शाम घी के दीपक जलाकर माँ दुर्गा की आरती करें।
• ब्रह्मचर्य का पालन करे
• सात्विक भोजन करें।सेंधा नमक का उपयोग करें।
• दिन में नहीं सोये।
• पूरे घर को साफ और शुद्ध करें।
• यदि आप नवरात्रि का व्रत कर रहें हो तो जमीन पर सोयें।
• नवरात्रि के अंतिम तिथि या अष्टमी को कुँवारी कन्याओं को आमंत्रित कर के, उनका पूजन करें और भोजन करायें।कन्याओं की उम्र २ से ५ वर्ष की हो तो अति उत्तम ।पूजा के पश्चात् कन्याओं को कुछ उपहार भी दें।
नवरात्री व्रत के दौरान क्या नहीं करें :-
• हजामत ना बनवायें और बाल ना कटवायें। स्त्रियाँ भी पार्लर ना जायें।
• जो व्यक्ति अखण्ड ज्योति जलाकर पूजा करते हों, वे अपना घर खाली ना छोड़ें।
• पूजा करते समय चमड़े से बनी वस्तु को धारण ना करें ।
• पूजा के वक्त काले रंग के कपड़े धारण ना करें।
• मांसाहारी भोजन, नशीले पदार्थ का सेवन ना करें।
• किसी को कष्ट ना पहुँचायें।
• झूठ ना बोलें।

सोमवती अमावस्या व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन हिंदी में- हिंदी मास के अनुसार हर मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं ।
Somvati Amavasya vrat vidhi and Katha in Hindi According to Hindi Calender Amavasya falls in every month. But when it comes on Monday it is called Somvati Amavasya.

वट सावित्री व्रत विधि, पूजन सामग्री एवं कथा हिंदी में- ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है।
Vat Savitri Vrat Katha and Pujan Vidhi in Hindi - Vat savitri falls on amavasya tithi of krishna paksha jyeshta month. The woman who did this Vrat has got immortal suhag.


अनंत चतुर्दशी व्रत विधि एवं कथा हिंदी में - अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि की पूजा की जाती है । यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है ।
Anant Chaturdashi Vrat Katha and Vidhi in Hindi- People Worshipped God vishnu on Anant Chaturdashi. It falls on fourth day of Shukla Paksha Bhadra Month.

करवा चौथ व्रत विधि एवं कथा - करवा चौथ का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी उम्र के लिये करती हैं।
Karwa Chauth vrat vidhi and katha in Hindi - Karvaa chauth celebrates on fourth day of waning moon in kaartik month. Married women keep this fast with benediction of her husband long life.

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