गुरु पूर्णिमा
Guru Purnima

आषाढ़ की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा को ही व्यास जी का जन्म हुआ था ।
इसी पूर्णिमा तिथि को उन्होंने अपनी समस्त रचना वेद शास्त्र पुराण और महाभारत का श्रीगणेश किया था।
यह तिथि शिष्य ,विद्यार्थियों के लिये अपने गुरु की पूजा का दिन है।
प्राचीन समय से इस तिथि को सभी शिष्य स्नान कर शुद्ध हो, अपने-अपने गुरु के पास जाते हैं। गुरु को उच्च स्थान पर बैठाकर षोडशोपचार विधि से उनकी पूजाकरते हैं । उन्हें पुष्प अर्पित करते हैं। माला पहनाते हैं , धूप, दीप दिखाकर आरती करते हैं ।फल,वस्त्र, नैवेद्य, द्रव्य (पैसे) उनके चरणों पर अर्पित करते हैं।
स्वयं के द्वारा किये हुये घमंड, भूल, गलती आदि के लिये अपने गुरु से क्षमा माँगते हैं। गुरु जी से आशीर्वाद लेते हैं। इस अवसर पर गुरु प्रवचन एवं महाभारत सुनने-सुनाने का विशेष प्रचलन है।
गुरु व्यास हीं सभी वेद-शास्त्र, पुराण तथा महाभारत के रचयिता, संरक्षक एवं संग्राहक है। इन्हीं सब कारणों से व्यास जी को वेदव्यास भी कहते हैं। इनकी सभी रचनाएँ ,कृतियाँ शास्वत हैं।

महर्षि वेदव्यास

महर्षि वेदव्यास के पिता ऋषि पराशर तथा माता सत्यवती हैं। वेदव्यास भारतीय ज्ञानविज्ञान की महिमा के अपूर्व ,अद्भूत,अतुलनीय, प्रेरक एवं उद्धारक हैं। उन्होंने अपने सभी रचनाओं में अपने ज्ञान,अनुभव और विचारशीलता की ऐसी धरोहर संग्रहीत की है जो कि युगों-युगों तक मनुष्य के लिये कल्याणकारी रहेगी। उन्होंने जो कृतियाँ सौंपी है उसके लिये सारा मानव-समुदाय उनके प्रति सदा-सदा के लिये नत मस्तक रहेगा।
व्यास कृष्ण वर्ण के थे और यमुना नदी के तट पर स्थित एक द्वीप पर रहते थे। इसलिये इन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास भी कहते हैं। इन्होंने हिमालय की गुफाओं के पास अवस्थित बदरी वन में कठिन तपस्या की। इसी वन में उन्होंने अध्ययन-अध्यापन भी किया इसलिये उन्हें बादरायण के नाम से भी जाना जाता है। जैल,वैशम्पायन,जैमिनी तथा सुमतु इनके चार प्रमुख शिष्य थे।
भारतीय संसकृति और जन जीवन से चिरकाल से सम्बंधित वेदव्यास जनता के जनगुरु हैं, लोक गुरु हैं, युग गुरु हैं, इन्हीं गुरु के स्मृति में आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है। इस तिथि को गुरु का पर्व भी कहा जाता है।
इस पर्व के अवसर पर गुरु का आदर्श था- जिस प्रकार जल जलाशय अथवा नदियों की ओर प्रवाहित होता है, दिन और मास जिस प्रकार वर्ष के ओर चलते हैं। उसी प्रकार सभी शिष्य मेरे पास आयें । उनकी शंकाएँ दूर हों एवं उनका ज्ञान निरन्तर गतिमान हो। उनकी वृत्ति (चरित्र) सन्यत और पवित्र बने और ऐसे उज्जवल चरित्र शिष्यों के द्वारा मेरी कीर्ति सर्वत्र फैले।
शिष्य का आदर्श था- इतनी वत्सलता इतनी ममता हमें और कहाँ मिलेगी , हम केवल आपको पहचानते हैं । हम आपकी शरण में हैं और आपकी छोटी-से-छोटी आज्ञा भी हमारे लिये अ‍काट्य है। आप ही हमारे पिता, आप हीं हमें उस पार ले जाने वाले हैं, आपके समान संसार में दूसरा कौन है, जो गुरु कहलाये? आपको मेरा बार-बार प्रणाम स्वीकार हो।

सोमवार व्रत ( Monday Fast)

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