श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत विधि एवं कथा
Krishna Dwadashi Vrat Vidhi and Katha

आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत होता है । इस तिथि को भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा की जाती है । इसी व्रत के प्रभाव से माता देवकी और वसुदेव जी को श्रीकृष्ण जी पुत्र के रूप में प्राप्त हुये थे । इस व्रत को करनेवाले को अतुल वैभव की प्राप्ति होती है।वह इस लोक के सभी सुख भोगकर श्रीहरि के धाम को जाता है।

श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत पूजन सामग्री:-

∗श्रीकृष्ण जी की मूर्ति
∗कलश- 4
∗वस्त्र- 3
∗चौकी
∗पात्र- 4
∗तिल
∗धूप
∗दीप
∗अक्षत
∗चंदन
∗पुष्प
∗पुष्पमाला
∗नैवेद्य

श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत विधि - Krishna Dwadashi Vrat Vidhi

आषाढ़ मास की दशमी तिथि को नियमपूर्वक भगवान श्री हरि का पूजन करें । उस समय पवित्र वस्त्र धारण कर विधिपूर्वक हवन करें । प्रसन्न मन से रहकर व्रती पुरुष को भली-भाँति सिद्ध किया हुआ हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुन: प्रात: काल उठकर शौच के बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअन से मुख को शुद्ध करें । दतुअन के लिये किसी दूधवाले वृक्ष का लकड़ी उपयोग करे। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीर के नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारों को स्पर्श कर फिर भगवान् जनार्दन का ध्यान करे। ध्यान का प्रकार यह है-

dwadashi puja vidhi

इस प्रकार कहकर दिन में नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रि के समय देवाधिदेव भगवान नारायण के समीप बैठकर ‘ऊँ नमो नारायणाय’ इस मंत्र का जप कर व्रती को सो जाना चाहिये। फिर द्वादशी तिथि को प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समुद्र तक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाब पर जाकर अथवा घर पर सन्यमपूर्वक रहकर हाथ में पवित्र मिट्टी लेकर यह मंत्र पढ़े-

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फिर जल के देवता वरुणसे प्रार्थना करे-

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इस प्रकार का विधान सम्पन्नकर मिट्टी और जल हाथमें ले अपने सिर पर लगाये। साथ ही शेष बची हुई मृतिका को तीन बार समस्त अंगों में लगाये । फिर उपर्युक्त वारुण मंत्र पढ़कर विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान करने के पश्चात संध्या-तर्पण आदि नित्य-नियम सम्पन्न कर देवालय या फिर घर में बने पूजा गृह में जाये ।
सभी पूजन सामग्री एकत्रि कर लें। आसन पर बैठ जाये।
हाथ में अक्षत,कुंकुम, रोली एवं पुष्प लेकर श्रीहरि की निम्न मंत्रों से पूजन करें:-

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इसके बाद सामने चार जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उन कलशोंको मालाओं से अलंकृत कर उनपर तिल से भरे पात्र रखे । इन चार कलशों को चार समुद्र मानकर उनके मध्यभाग में एक चौकी को स्थापित करें। उस चौकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछायें एवं उसके ऊपर सनातन श्री हरि के चतुर्व्यूहरूप में अवतरित स्वर्णनिर्मित श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें। वस्त्र अर्पित करें । तत्पश्चात् पुष्प, चंदन एवं अर्घ्य आदि उपचारों से पूजा करे। द्वादशी की कथा सुने। भगवान् के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे । प्रात:काल सुर्योदय होनेपर स्नान कर, पूजा करें । उसके बाद वह प्रतिमा दक्षिणा सहित ब्राह्मण को दे । उसके बाद भोजन करें|

श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत कथा - Krishna Dwadashi Vrat Katha

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्रीकृष्ण द्वादशी व्रत करना चाहिये। इस व्रत का नियम दशमी के दिन से ही शुरु हो जाता है। व्रती को चाहिये की विधिपूर्वक संकल्प कर इस व्रत को करे।
दुर्वासा जी कहते हैं- “नियम के साथ इस व्रत को करनेवाले को जो पुण्य प्राप्त होता है , उसे सुनो-
यदुवंश में वसुदेव नामक एक श्रेष्ठ कुशल पुरुष हुए हैं। उनकी पत्नी का नाम देवकी था। देवकी पति के साथ-ही-साथ सभी व्रतों का अनुष्ठान करती थी। साथ हीं वे पाति व्रत-धर्मका पालन भी पूर्णरूप से पालन करती थीं। परन्तु उनके पुत्र नहीं था। बहुत समय व्यतीत होने पर एक दिन नारद जी वसुदेव जी से मिलने आये। उन्होंने भक्तिपूर्वक मुनि की पूजा की। फिर नारदजी ने कहा- “वसुदेव! मैं यहाँ देवताओं से सम्बंधित एक कार्य बताता हूँ, उसे सुनो। अनघ! मैंने स्वयं देखा है, देवताओं की सभा में जाकर पृथ्वी ने कहा हे- देवताओ! अब मैं भार ढ़ोने में असमर्थ हो गयी हूँ। दुर्जन दल बाँध कर मुझे दु:ख दे रहे हैं। अत: आपलोग उनका संहार करें।” इस प्रकार पृथ्वी के कहने पर देवताओं ने भगवान् नारायण का ध्यान किया। ध्यान करते हीं भगवान श्रीहरिने उनके सामने प्रकट होकर कहा-‘देवताओं! यह कार्य मैं स्वयं करने के लिये उद्यत हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं मनुष्य के रूप में मर्त्यलोक में जाऊँगा, किंतु जो स्त्री अपने पति के साथ आषाढ़ मास के शुक्ल पक्षकी द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करेगी, मैं उसी के गर्भ में निवास करूँगा।’
भगवान श्रीहरि के ऐसा कहने पर देवता तो अपने स्थान को चले गये, पर मैं (नारद) यहाँ आ गया हूँ। मेरे आने का विशेष कारण यह है कि आपकी कोई संतान (जीवित) नहीं है। अत: आपको यह बतला दूँ। इसी द्वादशी व्रत के करने से वसुदेवजी को श्रीकृष्ण-जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई । साथ ही उन यदुश्रेष्ठ को विशाल वैभव भी प्राप्त हो गया। जीवन में सुख भोगकर अंत में वे भगवान श्रीहरि के परम धाम को गये। मुने! आषाढ़मास में होनेवाली द्वादशीव्रत की विधि मैंने तुम्हें बतला दी।

सोमवती अमावस्या व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन हिंदी में- हिंदी मास के अनुसार हर मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं ।
Somvati Amavasya vrat vidhi and Katha in Hindi According to Hindi Calender Amavasya falls in every month. But when it comes on Monday it is called Somvati Amavasya.

वट सावित्री व्रत विधि, पूजन सामग्री एवं कथा हिंदी में- ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है।
Vat Savitri Vrat Katha and Pujan Vidhi in Hindi - Vat savitri falls on amavasya tithi of krishna paksha jyeshta month. The woman who did this Vrat has got immortal suhag.


अनंत चतुर्दशी व्रत विधि एवं कथा हिंदी में - अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि की पूजा की जाती है । यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है ।
Anant Chaturdashi Vrat Katha and Vidhi in Hindi- People Worshipped God vishnu on Anant Chaturdashi. It falls on fourth day of Shukla Paksha Bhadra Month.

करवा चौथ व्रत विधि एवं कथा - करवा चौथ का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी उम्र के लिये करती हैं।
Karwa Chauth vrat vidhi and katha in Hindi - Karvaa chauth celebrates on fourth day of waning moon in kaartik month. Married women keep this fast with benediction of her husband long life.

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