कुर्म द्वादशी व्रत विधि एवं कथा
Kurm Dwadashi Vrat Vidhi and Katha

पौष मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को कुर्म द्वादशी व्रत होता है । इस वर्ष ०७ जनवरी (मंगलवार), २०२० को है। इस व्रत को करनेवाले के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वह पुरुष संसार चक्र का त्याग कर भगवान श्रीहरिके सनातन-लोक को चला जाता है। उसके पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं और वह शोभा तथा लक्ष्मीसम्पन्न होकर सत्यधर्म का भाजन बन जाता है। भक्ति के साथ व्रत करनेवाले उस पुरुष के अनेक जन्मों से संचित पाप दूर भाग जाते हैं तथा श्रीनारायण उसपर शीघ्र हीं प्रसन्न होते हैं।

कुर्म द्वादशी व्रत पूजन सामग्री:-

∗श्रीहरि के कुर्म स्वरूप की मूर्ति
∗मंदराचल पर्वत की मूर्ति
∗कलश- 4
∗वस्त्र- 3
∗चौकी
∗पात्र- 4
∗तिल
∗धूप
∗दीप
∗अक्षत
∗चंदन
∗पुष्प
∗पुष्पमाला
∗नैवेद्य

कुर्म द्वादशी व्रत विधि - Kurm Dwadashi Vrat Vidhi

पौष मास की दशमी तिथि को नियमपूर्वक भगवान श्री हरि का पूजन करें। उस समय पवित्र वस्त्र धारण कर विधिपूर्वक हवन करें । प्रसन्न मन से रहकर व्रती पुरुष को भली-भाँति सिद्ध किया हुआ हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुन: प्रात: काल उठकर शौच के बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअन से मुख को शुद्ध करें । दतुअन के लिये किसी दूधवाले वृक्ष का लकड़ी उपयोग करे। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीर के नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारों को स्पर्श कर फिर भगवान कुर्म का ध्यान करे। ध्यान का प्रकार यह है-

dwadashi puja vidhi

इस प्रकार कहकर दिन में नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रि के समय देवाधिदेव भगवान नारायण के समीप बैठकर ‘ऊँ नमो नारायणाय’ इस मंत्र का जप कर व्रती को सो जाना चाहिये। फिर द्वादशी तिथि को प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समुद्र तक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाब पर जाकर अथवा घर पर सन्यमपूर्वक रहकर हाथ में पवित्र मिट्टी लेकर यह मंत्र पढ़े-

dwadashi puja vidhi

फिर जल के देवता वरुणसे प्रार्थना करे-

dwadashi puja vidhi

इस प्रकार का विधान सम्पन्नकर मिट्टी और जल हाथमें ले अपने सिर पर लगाये। साथ ही शेष बची हुई मृतिका को तीन बार समस्त अंगों में लगाये । फिर उपर्युक्त वारुण मंत्र पढ़कर विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान करने के पश्चात संध्या-तर्पण आदि नित्य-नियम सम्पन्न कर देवालय या फिर घर में बने पूजा गृह में जाये ।
सभी पूजन सामग्री एकत्रि कर लें। आसन पर बैठ जाये।
दुर्वासाजी कहते हैं- मुने! पौषमासका कूर्म-द्वादशीव्रत भी मार्गशीर्ष मास के मत्स्य-द्वादशी के समान ही हैं। इसी मास में देवताओंने समुद्र्का मंथन कर अमृत प्राप्त किया थाउस समय भक्तों को अभिलषित पदार्थ देनेमें कुशल स्वयं भगवान् नारायण कच्छप-रूप से अवतरित हुए थे।उस दिन यही महान पवित्र तिथि थी। अत: पौष मास के शुक्ल पक्ष की यह दशमी – इस कूर्मरूप धारण करनेवाले परम प्रभु परमात्मा की तिथि है। व्रतीको चाहिये कि पूर्वकथानुसार दशमी तिथि के दिन स्नान आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्न कर एकादशी तिथि में भक्तिके साथ भगवान् श्रीजनार्दन की आराधना करे। मुनिवर! पूजा के मंत्र अलग-अलग हैं । उन मंत्रों से भगवान श्रीहरि का पूजन होना आवश्यक है। ‘ऊँ कूर्माय नम:’ ‘ऊँ नाराणाय नम’ ‘ऊँ सङ्कर्षणाय नम:’ ‘ऊँ विशोकाय नम:’ ‘ऊँ भवाय नम:’ ‘ऊँ सुवाहवे नम:’ ‘ऊँ विशालाय नम:’ । इन वाक्यों का उच्चारण कर क्रमश: भगवान् श्रीहरिके चरण,कटिभाग, उदर,वक्ष:स्थल,कण्ठ,भुजाएँ एवं सिर की भलीभाँति (पूर्वोक्त प्रकारसे भी) पूजा करनी चाहिये।
फिर “भगवन्! आपके लिये नमस्कार है” – ऐसा कहना चाहिये । पुन: नाम-मंत्र का उच्चारण कर सुन्दर चन्दन,पुष्प, धूप,फल और नैवेद्य आदि अद्भुत उपचारों से परम प्रभु भगवान् श्रीहरि की पूजा करें।
इसके बाद सामने चार जलपूर्ण कलश स्थापित करे। कलश को माला और दो वस्त्र से सुसज्जित एवं अलंकृत करें । कलश के भीतर रत्न डालें तथा ऊपर घृत से भरा हुआ ताँबे का एक पात्र रखकर उसीमें प्रतिमा का अभिधारण करें। इन चार कलशों को चार समुद्र मानकर उनके मध्यभाग में एक चौकी को स्थापित करें। उस चौकी के ऊपर भगवान कूर्म की सुवर्ण की मूर्ति स्थापित करें। साथ में मन्दराचलकी भी प्रतिमा रखें। तत्पश्चात् पुष्प,चंदन एवं अर्घ्य आदि उपचारों से पूजा करे। उस समय मन में संकल्पकरें- “मैं कल अपनीशक्ति के अनुरूप दक्षिणा आदि से ब्राह्मणों की पूजा करूँगा। इसमें कूर्म-रूप में प्रकट होनेवाले देवाधिदेव! भगवान् नारायण को मैं प्रसन्न करना चहता हूँ। ” द्वादशी की कथा सुने।भगवान् के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे । प्रात:काल सुर्योदय होनेपर स्नान कर, पूजा करें । उसके बाद वह प्रतिमा और दक्षिणा ब्राह्मण को दे । उसके बाद भोजन करें।
विप्र! इस प्रकार कार्यसम्पन्न करनेपर व्रतकर्ता के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वह पुरुष संसार चक्र का त्याग कर भगवान श्रीहरिके सनातन-लोक को चला जाता है।उसके पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं और वह शोभा तथा लक्ष्मीसम्पन्न होकर सत्यधर्म का भाजन बन जाता है। भक्ति के साथ व्रत करनेवाले उस पुरुषके अनेक जन्मों से संचित पाप दूर भाग जाते हैं तथा श्रीनारायण उसपर शीघ्र हीं प्रसन्न होते हैं।

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