मनोरथ पूर्णिमा व्रत विधि एवं कथा
Manoram Purnima vrat vidhi and katha in hindi

सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण करने के लिये मनोरथ पूर्णिमा का व्रत करना चाहिये। इस वर्ष मनोरथ पूर्णिमा व्रत शुरु करने की तिथि है १२ मार्च, २०१७ (रविवार), फाल्गुन पूर्णिमा और अंतिम व्रत अर्थात उद्यापन तिथि होगी ३१ जनवरी, २०१८ ( बुधवार) माघ पूर्णिमा। मनोरथ पूर्णिमा का व्रत फाल्गुन पूर्णिमा के दिन से शुरु किया जाता है। इस व्रत में फाल्गुन पूर्णिमा से शुरु करके प्रत्येक माह के पूर्णिमा को विधि पूर्वक भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। यह व्रत पूरे एक वर्ष तक करने का विधान है। पूरे वर्ष के पूर्णिमा को विधिपूर्वक पूजन कर यह व्रत सम्पन्न किया जाता है।
मनोरथ पूर्णिमा का व्रत करने से हर प्रकार की मनोकामना पूर्ण होती है। विधि पूर्वक व्रत करने से मनुष्य को इष्ट वियोग नहीं होता । भगवान जनार्दन और लक्ष्मी जी की कृपा से मनुष्य के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

मनोरथ पूर्णिमा व्रत की तिथि :-

पहला व्रत :- १२ मार्च, २०१७ (रविवार)
दूसरा व्रत :- १० अप्रैल ,२०१७(सोमवार)
तीसरा व्रत :- १० मई , २०१७ (बुधवार)
चौथा व्रत :- ०९ जून, २०१७(शुक्रवार)
पाँचवा व्रत :- ०८ जुलाई , २०१७(शनिवार)
छठा व्रत :- ०७ अगस्त, २०१७ (सोमवार)
सातवाँ व्रत :- ०५ सितम्बर, २०१७ (मंगलवार)
आठवाँ व्रत :- ०५ ,अक्टूबर ,२०१७(बृहस्पतिवार)
नौ व्रत :- ०४ नवम्बर ,२०१७ (शनिवार)
दस व्रत :- ०३ दिसम्बर ,२०१७(रविवार)
ग्यारह व्रत :- ०१ जनवरी,२०१७ (सोमवार)
अंतिम व्रत :- ३१ जनवरी ,२०१७ (बुधवार)

पूजन सामग्री:-

• भगवान जनार्दन और लक्ष्मी जी की मूर्ति या चित्र
• पान
• सुपारी
• अक्षत
• चंदन
• धूप
• दीप
• घी
• गंगाजल
• लोटा(अर्घ्य के लिये)
• नैवेद्य
• ऋतुफल
• पीला वस्त्र ( एक चौकी पर बिछाने के लिये और दो अर्पित करने के लिए)
• कपूर
• पुष्प
• पुष्पमाला
• तुलसी दल

मनोरथ पूर्णिमा व्रत विधि - Manohar Purnima Vrat Vidhi

मनोरथ पूर्णिमा के दिन प्रात:काल उठकर नित्य क्रम और स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें। य्स्दि सम्भव हो तो नदी या तालाब में स्नान करें अन्यथा घर पर हीं गंगा जल मिलाकर स्नान कर लें। पूजा गृह को साफ कर लें। लकड़ी के पटरे या चौकी पर पीला कपड़ा रखें। उस पर भगवान जनार्दन के साथ लक्ष्मी जी की प्रतिमा अथवा चित्र को रखें। सभी पूजन- सामग्री एकत्रित कर लें।
हाथ में जल, अक्षत, साबुत पान का पत्ता डंडी सहित, सुपारी तथा कुछ सिक्के लेकर निम्न मंत्र सेसंकल्प करे :-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे फाल्गुनमासे शुक्लपक्षे पूर्णिमातिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं अमुक कार्यसिद्धियार्थ मनोरथ पूर्णिमा व्रत प्रारम्भ करिष्ये ।
सभी सामग्री भगवान के पास छोड़ दें।
सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें।
तत्पश्चात भगवान जनार्दन तथा लक्ष्मी जी की पूजा षोडशोपचर विधि से करें। पूजन के बाद मनोरथ पूर्णिमा महात्म्य सुने अथवा सुनाये। उसके बाद भगवान नारायण और लक्ष्मी जी की आरती करें । आरती का तीन बार प्रोक्षण करीं। देवी-देवताओं को आरती दिखायें। उसके बाद उपस्थित जनों को आरती दें एवं स्वयं भी आरती लें।पूरे दिन भगवान के नामों का स्मरण और कीर्तन करें। शाम को चंद्रमा निकलने पर चंद्रमा में भगवान नारायण और लक्ष्मी जी के स्वरूप को मानते हुये अर्घ्य प्रदान करें। उसके बाद बिना तेल और नमक का भोजन करें। ब्राह्मणों को दान दें। सम्भव हो तो प्रत्येक माह वस्त्र, छाता, जूता एवं दक्षिणा ब्राह्मण को दे।

अलग-अलग मास के मुख्य नियम और विधि: -

फाल्गुन,चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ- इन महीनों में पूजन एवं अर्घ्य प्रदान कर व्रती प्रथम पारणा करें।
आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन- इन चार महीनों की पूर्णिमा को श्रीसहित भगवान श्रीधर का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करे और दूसरी पारणा करे।
कार्तिक,मार्गशीर्ष,पौष तथा माघ- इन चार महीनों में भूतिसहित भगवान केशव का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करे और तीसरी पारणा सम्पन्न करे।
प्रत्येक पारणा के अंत में ब्राह्मणों को दक्षिणा दे।
प्रथम पारणा के चार महीनों में पंचग्व्य, दूसरीपारणा के चार महीनों में कुशोदक और तीसरी पारणा में सुर्यकिरणों से तप्त जल का प्राशन करे।

मनोरथ पूर्णिमा व्रत कथा प्रारम्भ

भगवान श्री कृष्ण युधिष्ठिर से बोले- “राजन! फाल्गुन की पूर्णिमा से संवत्सर पर्यन्त किया जानेवाला एक व्रत है, जो मनोरथ पूर्णिमा के नाम से विख्यात है। इस व्रत के करने से व्रती के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते है। व्रती को चाहिये कि वह फाल्गुन पूर्णिमा को स्नान आदि कर लक्ष्मी सहित भगवान जनार्दन का पूजन करे और चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय जनार्दन का स्मरण करता रहे और पाखण्ड ,पतित ,नास्तिक, चाण्डाल आदि से सम्भाषण न करे, जितेन्द्रिय रहे। रात्रि के समय चंद्रमा में नारायण और लक्ष्मी जी की भावना कर अर्घ्य प्रदान करे। बाद में तैल एवं लवणरहित भोजन करे। इसी प्रकार चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ- इन तीन महीनों में भी पूजन एवं अर्घ्य प्रदान कर व्रती प्रथम पारणा करें।
आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन- इन चार महीनों की पूर्णिमा को श्रीसहित भगवान श्रीधर का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करे और पूर्ववत दूसरी पारणा करे। कार्तिक,मार्गशीर्ष,पौष तथा माघ- इन चार महीनों में भूतिसहित भगवान केशव का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करे और तीसरी पारणा सम्पन्न करे। प्रत्येक पारणा के अंत में ब्राह्मणों को दक्षिणा दे। प्रथम पारणा की चार महीनों में पंचग्व्य, दूसरीपारणा के चार महीनों में कुशोदक और तीसरी पारणा में सुर्यकिरणों से तप्त जल का प्राशन करे। रात्रि के समय गीत-वाद्य द्वारा भगवान का कीर्तन करे।
प्रतिमास जलकुम्भ, जूता, छतरी, सुवर्ण ,वस्त्र, भोजन और दक्षिणा ब्राह्मणों को दान करे। देवताओं के स्वामी भगवान की मार्गशीर्ष आदि बारह महीनों में क्रमश: केशव, नारायण, माधव, गोविंद, विष्णु,मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर या हृषीकेश, राम, पद्मनाभ अथवा दामोदर और देवदेवेश –इन नामों का कीर्तन करने वाला व्यक्ति दुर्गति से उद्धार पा जाता है। इस व्रत को करने से यदि प्रतिमास दान देने में समर्थ न हो तो वर्ष के अंत में यथाशक्ति सुवर्ण का चंद्र बिम्ब बनाकर फल,वस्त्र आदि से पूजन कर ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। इस प्रकार व्रत करनेवाले पुरुष को अनेक जन्म पर्यन्त इष्ट का वियोग नहीं होता । उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और वह पुरुष नारायण का स्मरण करता हुआ दिव्यलोक प्राप्त करता है।”

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