मासिक कृष्णाष्टमी व्रत विधि
Masik krishnashtami Vrat Vidhi

प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि कृष्णाष्टमी कहलाती है। कृष्णाष्टमी को भगवान शंकर की पूजा , आराधना और व्रत करने का विधान है। इस व्रत के करने से सभी प्रकारके भय का नाश होता है। इस मासिक कृष्णाष्टमी व्रत को जो एक वर्ष तक निरंतर करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करता है और सौ वर्ष पर्यंत संसार के आनन्दों का उपभोग करता है।
इसी व्रत का अनुष्ठान कर इंद्र, चंद्र, ब्रह्मा तथा विष्णु आदि देवताओं ने उत्तम-उत्तम पदों को प्राप्त किया है। जो स्त्री-पुरुष इस व्रत को भक्तिपूर्वक करते हैं , वे उत्तम विमानों में बैठकर देवताओं द्वारा स्तुत होते हुये शिवलोक में जाते हैं और भगवान शंकर के ऐश्वर्य से सम्पन्न हो जाते हैं।वहाँ आठ कल्प पर्यंत निवास करते हैं और जो इस व्रत के महात्म्य को सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

पूजा सामग्री:-

•लकड़ी की चौकी
•शिवजी की मूर्ति
•सफेद वस्त्र
•धूप
•दीप
•गंध
•सफेद चंदन
•पुष्प
•गुग्गुल
•नैवेद्य
•ताम्बूल
•कपूर

हवन के लिये:-

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•हवन कुण्ड
•आम की समिधा -१.२५ कि.ग्रा.
•काले तिल
•घी

पूजा विधि:-

मार्गशीर्ष मासकी कृष्णाष्टमी को यह व्रत आरम्भ करना चाहिये और पूरे एक वर्ष तक इस व्रत का पालन करें। प्रात:काल उठकर नित्य कर्म कर स्नान कर दैनिक पूजा करें। दोपहर के बाद नदी अथवा घर पर हीं स्नान कर शुद्ध हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें।पूजा गृह को शुद्ध कर लें।आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जायें।लकड़ी के चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर शिव जी की मूर्ति स्थापित करें।
गंध,उत्तम पुष्प, गुग्गुल, धूप, दीप, अनेक प्रकार के नैवेद्य तथा ताम्बूल आदि उपचारों से शिवलिंग का पूजन कर। पूजन के बाद हवन कुंड में आम की लकड़ी सजायें। हवन कुंड की पूजा करें। अग्नि प्रज्वलित करें। काले तिल में घी मिलाकर शिव के मंत्रों के द्वारा १०८ बार हवन करें। इस विधि से प्रत्येक मास में शिवजी का पूजन करे और रात्रि में भूमि पर शयन करे।

प्रत्येक मास में आनेवाली कृष्णाष्टमी के व्रत में शिव के विभिन्न रूपों के पूजन का उल्लेख तथा उससे होनेवाले फल :-

चैत्र मास की कृष्णाष्टमी में स्थानु नाम से शिवका पूजन कर यव का भोजन करने से अश्वमेघ-यज्ञ का फल मिलता है।
वैशाख मास की कृष्णाष्टमी में शिव नाम से इनका पूजन कर रात्रि में कुशोदक-पान करने से दस पुरुषमेध यज्ञोंका फल मिलता है।
ज्येष्ठ मास की कृष्णाष्टमी में पशुपति नाम से भगवान शंकर का पूजन कर गोश्रृंगजलका पान करने से लाख गोदान का फल मिलता है।
आषाढ़ मास की कृष्णाष्टमी में उग्र नाम से शंकर का पूजन कर गोमय-प्राशन करनेवाला दस लाख वर्ष से भी अधिक समय तक रुद्रलोक में निवास करता है।
श्रावण मास की कृष्णाष्टमी में शर्व नाम से भगवान शंकर की पूजाकर रात्रि में अर्क-प्राशन करने से बहुत-सा सुवर्ण दान किये जानेवाले यज्ञका फल मिलता है।
भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी में त्रयम्बक नाम से इनकी पूजा कर एवं बिल्व-पत्र भक्षण करने से अन्न-दान का फल मिलता है।
आश्विन मास की कृष्णाष्टमी में भव नाम से भगवान शंकर का यजन कर तण्डुलोदक का पान करने से सौ पुण्डरीक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
कार्तिक मास की कृष्णाष्टमी में रुद्र नाम से भगवान शंकर की भक्ति से पूजाकर रात्रि में दही का प्राशन करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
मार्गशीर्ष मासकी कृष्णाष्टमी को उपवासके नियम ग्रहण कर जितेंद्रिय और क्रोधरहित हो गुरु के आज्ञानुसार उपवास करे। शिवजी का पूजन करे और रात्रि में भूमि पर शयन करे; इससे अतिरात्र यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
पौष मास की कृष्णाष्टमी को शम्भू नाम से महेश्वर का पूजन कर घृत प्राशन करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
माघ मास की कृष्णाष्टमी को महेश्वर नाम से भगवान शंकर का पूजन कर गोदुग्ध-प्राशन करने से अनेक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
फाल्गुन मास की कृष्णाष्टमी में महादेव नाम से उनका पूजन कर तिल भक्षण करने से आठ राजसुय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

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