नृसिंह द्वादशी व्रत विधि एवं कथा
Nrisingh Dwadashi Vrat Vidhi and Katha

फागुन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को नृसिंह द्वादशी व्रत होता है । इस तिथि को भगवान के नृसिंह अवतार की पूजा की जाती है । इस व्रत को करने से सभी प्रकार के शत्रुओं का नाश होता है।

नृसिंह द्वादशी व्रत पूजन सामग्री:-

∗नृसिंह जी की मूर्ति
∗कलश- 1
∗वस्त्र- 2
∗चौकी
∗पात्र- 1
∗तिल
∗धूप
∗दीप
∗अक्षत
∗चंदन
∗पुष्प
∗पुष्पमाला
∗नैवेद्य

नृसिंह द्वादशी व्रत विधि - Narasimha Dwadashi Vrat Vidhi

फागुन मास की दशमी तिथि को नियमपूर्वक भगवान श्री हरि का पूजन करें । उस समय पवित्र वस्त्र धारण कर विधिपूर्वक हवन करें । प्रसन्न मन से रहकर व्रती पुरुष को भली-भाँति सिद्ध किया हुआ हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुन: प्रात: काल उठकर शौच के बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअन से मुख को शुद्ध करें । दतुअन के लिये किसी दूधवाले वृक्ष का लकड़ी उपयोग करे। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीर के नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारों को स्पर्श कर फिर भगवान् जनार्दन का ध्यान करे। ध्यान का प्रकार यह है-

dwadashi puja vidhi

इस प्रकार कहकर दिन में नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रि के समय देवाधिदेव भगवान नारायण के समीप बैठकर ‘ऊँ नमो नारायणाय’ इस मंत्र का जप कर व्रती को सो जाना चाहिये। फिर द्वादशी तिथि को प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समुद्र तक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाब पर जाकर अथवा घर पर सन्यमपूर्वक रहकर हाथ में पवित्र मिट्टी लेकर यह मंत्र पढ़े-

dwadashi puja vidhi

फिर जल के देवता वरुणसे प्रार्थना करे-

dwadashi puja vidhi

इस प्रकार का विधान सम्पन्न कर मिट्टी और जल हाथमें ले अपने सिर पर लगाये। साथ ही शेष बची हुई मृतिका को तीन बार समस्त अंगों में लगाये । फिर उपर्युक्त वारुण मंत्र पढ़कर विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान करने के पश्चात संध्या-तर्पण आदि नित्य-नियम सम्पन्न कर देवालय या फिर घर में बने पूजा गृह में जाये ।
सभी पूजन सामग्री एकत्रि कर लें। आसन पर बैठ जाये।
हाथ में अक्षत,कुंकुम, रोली एवं पुष्प लेकर श्रीहरि की निम्न मंत्रों से पूजन करें:-
ऊँ नरसिंहाय नम: ( हाथ के रोली, पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के चरण की पूजा करें ।
ऊँ गोविंदाय नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान कल्कि श्रीहरि के ऊरुओं की पूजा करें ।
ऊँ विश्वभुजे नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान हरि के कटिप्रदेश की पूजा करें ।
ऊँ अनिरुद्धाय नम: ( हाथ के रोली, पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के वक्ष:स्थल की पूजा करें ।
ऊँ शितिकण्ठाय नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के कण्ठ की पूजा करें ।
ऊँ पिंगकेशाय नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के शिरोदेश की पूजा करें ।
ऊँ असुरध्वंसाय नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के चक्र की पूजा करें ।
ऊँ तोयात्मने नम: ( हाथ के रोली,पुष्प आदि समर्पित करें ) भगवान के शंख की पूजा करें ।

तत्पश्चात् भगवान के सामने दो सफेद वस्त्रों से सम्पन्न एक कलश रखें । उस कलश पर एक ताँबे का पात्रअथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार काष्ठ या बाँस का पात्र रखकर उसके ऊपर भगवान नृसिंह की स्वर्णमयी मूर्ति रखनी चहिये । घड़े में रत्न डालकर द्वादशी के दिन पूजा करने के उपरांत भगवानकी वह प्रतिमा वेद के विशेषज्ञ ब्राह्मण को अर्पण कर दें। उसके बाद भोजन करें|

नृसिंह द्वादशी व्रत कथा - Narasimha Dwadashi Vrat Katha

फागुन मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को नृसिंह द्वादशी व्रत होता है । इस तिथि को भगवान के नृसिंह अवतार की पूजा की जाती है । इस व्रत को करने से सभी प्रकार के शत्रुओं का नाश होता है। व्रती इस लोक के सभी सुख भोगकर अंत में विष्णु लोक को जाता है।
दुर्वासाजी कहते हैं- “मुनिवर! पहले कहे हुए व्रत की भाँति फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में नृसिंह-द्वादशी व्रत होता है। विद्वान पुरुष उस दिन उपवास करके विधि के साथ श्रीहरिकी आराधना करें।
ऊँ नरसिंहाय नम: कहकर भगवान नृसिंह के चरणों की , ऊँ गोविंदाय नम: से ऊरुओं की , ऊँ विश्वभुजे नम: से कटिप्रदेश की , ऊँ अनिरुद्धाय नम: से वक्ष:स्थल की , ऊँ शितिकण्ठाय नम: से कण्ठ की ,ऊँ पिंगकेशाय नम: कहकर शिरोदेश की , ऊँ असुरध्वंसाय नम: से चक्र की तथा ऊँ तोयात्मने नम: कहकर शंख की पूजा करें ।
तत्पश्चात् भगवान के सामने दो सफेद वस्त्रों से सम्पन्न एक कलश रखें । उस कलश पर एक ताँबे का पात्रअथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार काष्ठ या बाँस का पात्र रखकर उसके ऊपर भगवान नृसिंह की स्वर्णमयी मूर्ति रखनी चहिये । घड़े में रत्न डालकर द्वादशी के दिन पूजा करने के उपरांत भगवानकी वह प्रतिमा वेद के विशेषज्ञ ब्राह्मण को अर्पण कर दें।
महामुने ! इस प्रकार व्रत करनेपर एक राजा को जो फल मिला था, उसे मैं कहता हूँ, सुनो- किम्पुरुष वर्ष में भारत नाम से विख्यात एक धार्मिक राजा रहते थे। उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम वत्स था। किसी युद्ध में शत्रुओं से हारकर वह केवल अपनी स्त्री के साथ पैदल हीं वशिष्ठ जी के आश्रम पर गया अउर वहाँ रहने लगा । इस प्रकार वहाँ उनके आश्रम पर रहते हुए कुछ दिन बीत गये। एक दिन मुनि ने उससे पूछा- “राजन! तुम किस प्रयोजन से इस महान आश्रम में निवास कर रहे हो? ”
राजा वत्स ने कहा- “भगवन ! शत्रुओंने मुझे परास्त कर मेरा राज्य तथा खजाना छीन लिया है। अत: असहाय होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप अपने उपदेश- प्रदानद्वारा मेरे चित्त को शांत करने की कृपा किजिये। ”
दुर्वासाजी कहते हैं- “मुने! राजा वत्स के इस प्रकार कहने पर वसिष्ठ जी ने उसे विधिपूर्वक इस द्वादशी को ही करने का उपदेश दिया तथा उस राजा ने भी सअब कुछ वैसा ही किया। व्रत पूर्ण होने पर भगवान नृसिंह उस राजा पर प्रसन्न हुए और उन परम प्रभु ने उस राजा को एक ऐसा चक्र दिया, जो समराङ्गण में शत्रुओं का संहार कर सके । उस अस्त्र के प्रभाव से महाराज वत्स ने शत्रुओं को परास्त कर अपना राज्य फिर जीत लिया। राज्य पर आसीन होकर उस नरेश ने एक हजार अश्वमेघ यज्ञ किये और अंत में वह धर्मात्मा राजा भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुआ। ” मुने! पापों का नाश करनेवाली यह नृसिंह-द्वादशी धन्य है। तुम्हारे पूछने पर मैंने इसका वर्णन कर दिया। अब तुम इसे सुनकर अपनी इच्छा के अनुसार जैसा चाहे करो।

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Somvati Amavasya vrat vidhi and Katha in Hindi According to Hindi Calender Amavasya falls in every month. But when it comes on Monday it is called Somvati Amavasya.

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Karwa Chauth vrat vidhi and katha in Hindi - Karvaa chauth celebrates on fourth day of waning moon in kaartik month. Married women keep this fast with benediction of her husband long life.

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