पजूनो-पूनो - pajuno puno

चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को पजूनो-पूनो भी कहते हैं। इस वर्ष यह पूजा ११ अप्रैल, २०१७ मंगलवार (11 April 2017 - Tuesday) को है। इस तिथि में व्रत नहीं किया जाता, केवल पजन कुमार का पूजन होता है। यह पूजन उसी घर में होता है जिस घर में कोई लड़का होता है। जिस घर में केवल लड़कियाँ होती है, वहाँ यह पूजा नहीं होता है।

पजूनो-पूनो पुजा विधि - pajuno puno Puja vidhi

जिस घर में लड़के होते हैं, वहाँ यह पूजा होती है। इसमें किसी के यहाँ पाँच मटकियों की पूजा होती है, किसी के यहाँ सात मटकियाँ पूजी जाती है। जहाँ पाँच मटकियाँ पूजी जाती है, वहाँ चार मटकी और एक करवा (टोटीनुमा कलश) होता है। इसी तरह से सात मटकियों में छह मटकी और एक करवा होता है। मटकियों को चूना या खड़िया मिट्टी से रंगा जाता है। करवा पर हल्दी से पजन कुमार और उसकी दोनों माताओं का चित्र बनाया जाता है। पूजा गृह को साफ कर लें। रंगोली या चावल के आटे के घोल से चौक (अल्पना) बनायें। चौक के बीच में करवा और चारों ओर से मटकियाँ रखें। करवे को लड्डु से भर कर रखें और अन्य मटकियों में विभिन्न प्रकार के पकवान बना कर रखें। इसके बाद घर की महिलायें इन मटकियों तथा करवे का पूजन करें। चंदन,अक्ष त, धूप, दीप और नैवेद्य से अपने पारिवारिक परम्परा के अनुसार पूजन करें। इसके बाद सभी महिलाओं को अक्षत दें एवं कथा कहें अथवा सुने। कथा सुनने वक्त हाथ में अक्षत लेकर बैठा जाता है। कथा समाप्त होने पर सभी महिलायें अपने-अपने हाथों का अक्षत मटकियों पर चढ़ाये। उसके बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें। उसके बाद लड़का आकर सभी मटकियों को हिला दे। करवे (पजन कुमार की मटकी) में से लड़का लड्डु निकाल कर अपनी माँ के आँचल में रखें। फिर माँ अपने लड़के को अन्य मटकियों में से पकवान निकाल कर खाने को दे। उसके बाद सभी घर के सभी सदस्यों में प्रसाद के रूप में पकवान बाँटें । पकवान बाँटते समय कहे-
“पजन के लड़ुवा पजनै खायँ।
दौड़- दौड़ वही कोठरी में जायँ॥”

पजूनो – पूनो की कथा प्रारम्भ- pajuno puno Story Starts - Page 1/11

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