रामनवमी पूजा विधि एवं कथा - Ram Navami

चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी को रामचंद्र जी का जन्म हुआ था, अत: इस तिथि को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को तीसरे पहर यदि पुनर्वसु नक्षत्र पड़े तो वह तिथि बड़े पुण्यवाली होती है।
इस वर्ष रामनवमी ५ अप्रैल,२०१७ (बुधवार) को है। इस तिथि को राम जी के जन्म के उपलक्ष्य में हर जगह पूजा अर्चना की जाती है। कई जगहोंपर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से रामायण का पाठ भी किया जाता है। रामनवमी के दिन व्रत करके राम जी का विधिपूर्वक पूजन करें। रात्रि जागरण करते हुये प्रात:काल विधि के साथ रामचंद्रजी का पूजन करें। अपनी सामर्थ्यानुसार ब्राह्मणों को दान दें ।रामनवमी के व्रत से मनुष्य को मुक्ति प्राप्त होता है।
रामनवमी के दिन दिनभर उपवास करना और रात्रि जागरण चाहिए। दूसरे दिन सवेरे स्नानादि से निवृत होकर भगवान श्रीरामचंद्र जए का विधिपूर्वक पूजन और शक्ति के अनुसार ब्राह्मण को दान और भोजन कराना चाहिए।यह व्रत करनेवाला सुखी होता है और उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। रामनवमी के दिन रामचंद्र की सोने की प्रतिमा दान करने का भी विधान है। जो लोग प्रतिमा दान करना चाहें उन्हें सबसे पहले किसी ब्राह्मण के पास जाकर प्रार्थना करना चाहिए कि हे ब्राह्मण! मैं प्रतिमा दान करना चाहता हूँ। आप पूज्य हैं; आचार्य हैं; अत: राम जी की प्रतिमा मैं आपको दान करना चाहता हूँ। उसके बाद अष्टमी को हीं ब्राह्मण को अपने यहाँ ले आयें। उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराकर रात्रि भोजन करवायें।उसके बाद स्वयं भोजन करें।
नवमी के दिन प्रात:काल स्नानकर शुद्ध हो पूजा गृह में सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। चौकी अथवा लकड़ी के पटरे पर लाल वस्त्र बिछाकर, उस पर श्रीरामचंद्रजी की दो भुजाओं वाली सवर्ण की मूर्ति स्थापित करें। उसके बाद विधिपूर्वक पूजा करें। श्रीराम की कथा सुने। पूरे दिन उपवास रखें। रात्रि जागरण करें। दूसरे दिन प्रात:काल उठकर और स्नानादि से शुद्ध होकर प्रतिमा की पुन: पूजा करें। घी तथा खीर से 108 आहुतियों से हवन करें।
हवन के बाद मूर्ति को ब्राह्मण को दान में दे एवं सामर्थ्यानुसार दक्षिणा भी दें। उसके बाद स्वयं भोजन करें।

रामनवमी पूजन सामग्री:-

√ श्री रामजी की प्रतिमा
√ चौकी/ लकड़ी का पटरा
√ वस्त्र( दो लाल , एक पीला) – 3
√ यज्ञोपवीत
√ धूप
√ दीप
√ घी
√ नैवेद्य
√ ऋतुफल
√ कपूर
√ अक्षत
√ ताम्बूल
√ दूध
√ दही
√ घी
√ शहद
√ शर्करा
√ पान का पत्ता
√ सुपारी
√ गुड़
√ कपूर
√ पुष्प
√ दीप
√ तुलसी दल
√ फल
√ नारियल
√ कलश(मिट्टी का)
√ गंगाजल
√ शुद्ध जल
√ आसन

रामनवमी पूजन विधि:-

प्रात:काल उठकर नित्य कर्म कर, स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा गृह को शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर आसन पर बैठ जायें। चौकी अथवा लकड़ी के पटरे पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर श्री राम जी की मूर्ति स्थापित करें।
पवित्रीकरण:-
हाथ में जल ले कर निम्न मंत्र पढ़ते हुये जल अपने ऊपर छिड़क कर अपने आप को पवित्र कर लें ।
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
पृथ्वी पूजा:-
मन ही मन पृथ्वी माँ को प्रणाम करते हुये निम्न मंत्र पढ़े :-
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
आचमन :-
चम्मच से तीन बार एक- एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़ते हुय, दिये हुये मंत्र का उच्चारण किजिये -
ॐ केशवाय नमः
ॐ नारायणाय नमः
ॐ वासुदेवाय नमः
फिर ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए हाथों को खोलें और अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछ लें। इसक बाद शुद्ध जल से हाथ धो लें।

संकल्प :-
अब संकल्प करें । संकल्प के लिये दायें हाथ में गंगाजल(गंगाजल न हो तो शुद्ध जल में तुलसी पत्र डाल दें ), फूल , अक्षत , पान ( डंडी सहित) ,सुपारी, कुछ सिक्के हाथ में लेकर मंत्र के द्वारा रामनवमी पूजा का संकल्प करें :-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे चैत्रमासे शुक्लपक्षे नवमीतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं रामनवमी पूजा करिष्ये । उक्त संकल्प के बाद जल को भूमि पर छोड़ दें ।
गणेश पूजा:-
इसके बाद चौकी पर चावल का ढेर रखकर , उसपर गणेश जी की मूर्ति (यदि मूर्ति ना हो तो सुपारी पर मौली लपेट कर गणेश जी के रूप में रखें) स्थापित करें। अब पंचोपचार विधि से गणेश जी की पूजा करें।धूप,दीप, अक्षत,चंदन/सिंदूर एवं नैवेद्य समर्पित करते हुये गणेश जी की पूजा करें।
गुरु वंदना:-
दोनों हाथ जोड़कर अपने गुरु को नमन करें ।
कलश पूजन:-
मिट्टी के कलश में जल भर लें। उसमें दूर्बा, कुछ सिक्के,अक्षत डालें एवं गंगाजल मिलायें। आम का पल्लव डाल कर उसके ऊपर लाल कपड़े में नारियल लपेट कर रखें। चावल से चौकी के पास अष्टदल कमल बनायें। अष्टदल कमल पर कलश को रखें।कलश पर रोली से स्वासतिक बनायें। धूप, दीप, अक्षत, चंदन, नैवेद्य समर्पित करत हुये कलश की पूजा करें। दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र के द्वारा कलश को प्रणाम करें:-

ध्यान:-
दोनों हाथ जोड़कर श्री रामचंद्रजी का ध्यान करते हुये निम्न श्लोक पढ़ें:-

आवाहन:-
निम्न मंत्र के साथ भगवान श्रीरामचंद्र जी का आवाहन करें:-

आसन:- हाथ मे पुष्प और अक्षत लेकर निम्न मंत्र के द्वारा भगवान राम को आसन समर्पित करें:-

पाद्य:-
पुष्प से जल लेकर श्रीराम जी को पाद्य धोने के लोये जल समर्पित करते हुये निम्न मंत का उच्चारण करें:-

अर्घ्य:-
पुष्प से जल लेकर मंत्र के द्वारा अभिषेक के लिये श्रीरामजी को जल अर्पित करें:-


आचमन:-
पुष्प से जल लेकर मंत्र के द्वारा आचमन के लिये श्रीरामजी को जल अर्पित करें:-

मधुपर्कम्:- चम्मच में दूध तथा मधु लेकर मंत्र के साथ श्रीराम जी को अर्पित करें:-

स्नान:- पुष्प से स्नान के लिये श्रीराम जी को जल समर्पित करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:‌-

पंचामृत स्नान:-
दुग्ध स्नान- पुष्प से दुग्ध स्नान के लिये निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये श्रीराम जी को दूध समर्पित करें; उसक बाद शुद्ध जल समर्पित करें :‌-

दधि स्नान- पुष्प से दधि स्नान के लिये निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये श्रीराम जी को दधि समर्पित करें; उसके बाद शुद्ध जल समर्पित करें :‌-

घृतं स्नान- पुष्प से घृत स्नान के लिये निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये श्रीराम जी को घी समर्पित करें; उसके बाद शुद्ध जल समर्पित करें :‌-

मधु स्नान- पुष्प से मधु स्नान के लिये निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये श्रीराम जी को शहद समर्पित करें; उसके बाद शुद्ध जल समर्पित करें :‌-

शर्करा स्नान- पुष्प से शर्करा स्नान के लिये श्रीराम जी को शर्करा समर्पित करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:‌-

शुद्धोदक स्नान- पुष्प से शुद्ध जल लेकर शुद्धोदक स्नान के लिये श्रीराम जी को जल समर्पित करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें:‌-

वस्त्र:- हाथ में पीला वस्त्र लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को वस्त्र समर्पित करें:-

यज्ञोपवीत:- हाथ में यज्ञोपवीत लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को यज्ञोपवीत समर्पित करें:-

गंध:- हाथ में इत्र(गंध) लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को गंध समर्पित करें:-


अक्षत:- हाथ में अक्षत लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को अक्षत समर्पित करें:-

पुष्प:- हाथ में फूल तथा तुलसी दल लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को फूल तथा तुलसी दल समर्पित करें:-

अंग पूजा:- बायें हाथ में अक्षत तथा फूल लेकर मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी के विभिन्न अंगों के निमित्त थोड़ा-थोड़ा अक्षत,फूल रामजी के पास अर्पित करते जायें:-
ऊँ श्री रामचन्द्राय नम: ।पादौ पूजयामि॥
ऊँ श्री राजीवलोचनाय नम: ।गुल्फौ पूजयामि॥
ऊँ श्री रावणान्तकाय नम: ।जानुनी पूजयामि॥
ऊँ श्री वाचस्पतये नम: ।ऊरु पूजयामि॥
ऊँ श्री विश्वरूपाय नम: ।जङ्घे पूजयामि॥
ऊँ श्री लक्ष्मणाग्रजाय नम: ।कटि पूजयामि॥
ऊँ विश्वमूर्तये नम: ।मेढ़्र पूजयामि॥
ऊँ विश्वामित्र प्रियाय नम: ।नाभिं पूजयामि॥
ऊँ परमात्मने नम: ।हृदयं पूजयामि॥
ऊँ श्री कण्ठाय नम: ।कण्ठ पूजयामि॥
ऊँ सर्वास्त्रधारिणे नम: ।बाहू पूजयामि॥
ऊँ रघुद्वहाय नम: ।मुखं पूजयामि॥
ऊँ पद्मनाभाय नम: ।जिह्वां पूजयामि॥
ऊँ दामोदराय नम: ।दन्तान् पूजयामि॥
ऊँ सीतापतये नम: ।ललाटं पूजयामि॥
ऊँ ज्ञानगम्याय नम: ।शिर पूजयामि॥
ऊँ सर्वात्मने नम: ।सर्वाङ्ग पूजयामि॥
ऊँ श्री जानकीवल्लभं। ॐ श्री रामचन्द्राय नमः । सर्वाङ्गाणि पूजयामि।।
धूप:- मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को धूप समर्पित करें:-

दीप:- मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को दीप समर्पित करें:-

नैवेद्य:- मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को नैवेद्य(मिठाई) समर्पित करें तथा उसकी बद आचमन के लिये जल समर्पित करें:-:-

फल:- मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को फल समर्पित करें:-:-

ताम्बूल:-
पान के पत्ते को पलट कर उस पर लौंग,इलायची,सुपारी के टुकड़े तथा कुछ मीठा रखकर ताम्बूल बनायें। मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को ताम्बूल समर्पित करें:-

दक्षिणा:- मंत्र के उच्चारण के साथ श्रीराम जी को दक्षिणा समर्पित करें:-


आरती:- थाल में घी का दीपक तथा कर्पूर से रामजी की आरती करें:-
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन,हरण भवभय दारुणम्।
नव कंज लोचन, कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि,नव नील नीरद सुन्दरम्।
पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि, नौमि जनक सुतावरम्॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव, दैत्य वंश निकन्दनम्।
रघुनन्द आनन्द कन्द कौशल, चन्द्र दशरथ नन्द्नम्॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू, उदारु अंग विभूषणम्।
आजानुभुज शर चाप-धर,संग्राम जित खरदूषणम्॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
इति वदति तुलसीदास,शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कंज निवास कुरु,कामादि खल दल गंजनम्॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
मन जाहि राचेऊ मिलहि सो वर , सहज सुन्दर सांवरो।
करुणा निधान सुजान शील, सनेह जानत रावरो॥
॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥
आरती का जल से तीन बार प्रोक्षण करें, उसकी बाद सभी देवे-देवताओं को आरती दें। उपस्थित जनों को आरती दें तथा स्वयं भी लें।
मंत्र पुष्पांजलि:-हाथ में पुष्प लेकर खड़े हो जायें और निम्न मंत्र के द्वारा पुष्पांजलि समर्पित करें:‌-
ऊँ श्री जानकीवल्लभं। ॐ श्री रामचन्द्राय नमः । मंत्र पुष्पांजलि समर्पयामि।
प्रदक्षिणा:-अपने स्थान पर बायें से दायें की ओर घूमते हुये निम्न मंत्र के द्वारा प्रदक्षिणा करें:‌-
ऊँ श्री जानकीवल्लभं। ॐ श्री रामचन्द्राय नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि।
क्षमा प्रार्थना:- दोनों हाथ जोड़कर श्रीराम जी से पूजा में हुई त्रुटि के लिये क्षमा प्रार्थना करें :-

श्री राम कथा:-

सुर्यवंश में दशरथ नाम के एक राजा थे। उनकी तीन रानियाँ थी- कौशल्या,कैकयी तथा सुमित्रा। लेकिन राजा दशरथ के कोई संतान न था। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिसके प्रभाव से तीनों रानियाँ गर्भवती हुई और समय आने पर कौशल्या से राम, कैकयी से भरत तथा सुमित्रा से शत्रुघ्न एवं लक्ष्मण का जन्म हुआ।चारों ओर प्रसन्नता छा गई।चारों रजकुमार का लालन पालन होने लगा। उन दिनों राक्षसों का बहुत प्रकोप था। एक दिन गुरु विश्वामित्र अयोध्या नगरी पधारे। उन्होंने राजा दशरथ से श्रीराम और लक्ष्मण को माँगा जिससे वे अपना यज्ञ निर्विघ्न रूप से सम्पन्न कर सके। श्रीरामचंद्र और लक्ष्मण जी मुनि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम में चले गये। यज्ञ की रक्षा करते हुये श्रीरामचंद्र जी ने ताड़का नामक राक्षस का वध किया।उसी दौरान उन्होंने खर-दूषण का भी वध किया। मुनि विश्वामित्र का यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ।
उसके बाद मुनि विश्वामित्र दोनों राजकुमार को लेकर मिथिला नगरी की ओर चल पड़े, जहाँ राजा जनक ने अपनी पुत्री का स्वयम्वर आयोजित किया था। रास्ते में श्रीरामचंद्र जी ने पत्थर की बनी हुई अहिल्या को शाप मुक्त करवाया। कुछ दिनों बाद दोनों राजकुमार ,मुनि विश्वामित्र के साथ मिथिला नगरी पहुँचे।राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिये यह शर्त रखी थी कि जो भी राजकुमार या राजा शिवजी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायेगा,उसी के साथ वे अपनी पुत्री सीता का विवाह करेंगे।
दोनों राजकुमार, विश्वामित्र के साथ जनक के राज्यसभा में सीता के स्वयम्वर को देखने गये। प्रतिज्ञा के अनुसार सभी आमंत्रित राजाओं ने शिवजी के धनुष को उठाने की कोशिश की लेकिन सफल ना हो सके। यहदेखकर राजा जनक को बहुत निराशा हुई, तब मुनि विश्वामित्र ने श्रीरामजी को आज्ञा दी कि वे धनुष को उठाकर प्रत्यंचा कहडः-आये जिससे राजा जनक की प्रतिज्ञा पूरी हो।गुरु की आज्ञा पाकर श्रीरामचंद्र जी ने शिवजी के धनुष को उठायाऔर प्रत्यंचा चढ़ाने के समय वह धनुष टूट गया।
रामचंद्र जी का विवाह सीता जी के साथ हुआ। साथ ही लक्ष्मण का उर्मिला से, माण्डवी का भरत से और श्रुतिकिर्ती का शत्रुघ्न से विवाह सम्पन्न हुआ।
विवाह के कुछ दिनों के पश्चात राजा दशरथ ने श्रीरामचंद्र जी के राज्याभिषेक करने के लिये मुनि सए शुभ मुहुर्त निकलवाया। पूरे राज्य में राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी। तभी मंथरा नामक दासी के कहने पर कैकयी ने राजा दशरथ को अपने कोप भवन में बुलाया। जब राजा दशरथ , कैकयी के पास पहुँचे तब कैकयी ने महाराज दशरथ को उनके वचन की याद दिलाई, जो वचन राजा दशरथ ने कैकयी को युद्ध के समय अपनी सहायता करने के बाद दिया था।उस वचन को याद दिलाते हुये कैकयी ने कहा – राम के स्थान पर भरत का राज्याभिषेक और राम जी को चौदह वर्ष का वनवास ।
यह सुनकर राजा दशरथ मूर्छित हो गये। जब श्रीरामचंद्र जी को पता चला तो वे पिता के वचन को पूरा करने के लिये चौदह वर्ष के वनवास को जाने के लिये तैयार हो गये। सीता जी और लक्ष्मण जी भी , श्रीरामचंद्र के साथ वन को चले गये।
इधर पुत्र शोक में राजा दशरथ स्वर्ग की प्राप्ति हुई। भरत और शत्रुघ्न , उस समय ननिहाल में थे; जब वे लौट के आये तो अपनी माता कैकयी का मुँह देखना भी स्वीकार नहीं किया। भरत ने रामजी के पास वन में जाकर लौटने की विनती की , लेकिन पिता के वचन को पूरा करने का वास्ता देकर , रामचंद्र जी ने भरत को लौटने की आज्ञा दी। तब भरत ने श्रीराम जी का खड़ाऊँ माँगा, जिससे की उस खड़ाऊँ को राजगद्दी पर रखकर वे रामजी के सेवक के रूप में राज्य की देखभाल कर सकें।

लक्ष्मण जी ने शूर्पनखा की नाक काट ली।शूर्पनखा ,रावण की बहन थी। उसने रावण को सारी बातें बताई तथा ये भी कहा कि उन दोनो मुनिकुमारों के साथ एक अत्यंत सुंदर स्त्री भी है।रावण ने मारीच नामक राक्षस से मदद माँगे। मारीच स्वर्ण मृग बनकर कुटिया के आस-पास विचरने लगा। स्वर्ण –मृग को देखकर सीता जी ने रामचन्द्र जी से उसे पकड़ने को कहा‌। रामजी स्वर्ण-मृग के पीछे चल पड़े। कुछ देर के बाद स्वर्ण- मृग रूपी मारीच राक्षस चिल्लाया- “हे लक्ष्मण! हे सीते!” यह सुनकर सीताजी ने लक्ष्मण को अपने भ्राता के सहायता के लिये जाने को कहा। लक्ष्मण जी नहीं माने; किंतु सीता जी के बार-बार कहने पर लक्ष्मण जी ने अपने तीर से कुटिया के चारों ओर एक रेखा बनाई और सीता जी से कहा कि आप इस रेखा से बाहर नहीं आना। इसके बाद लक्ष्मण जी रामजी के पास चले गये।
लक्ष्मण जी के जाते हीं रावण एक साधु के वेष में आया और भिक्षा माँगने लगा। जब सीता जी ने रेखा के अंदर से भिक्षा दी ,तो इनकार करके कहने लगा कि मैं बंधन का भिक्षा नहीं लेता। जैसे हीं सीताजी रेखा के बाहर आई, रावण ने छल पूर्वक उनका हरण कर लिया।रास्ते में जटायु ने सीताजी को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन रावण के हाथों घायल हो मारा गया।
दूसरी ओर जब लक्ष्मण रामजी को खोजते हुये वन में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि स्वर्ण-मृग रूपी मारीच मरा हुआ है। रामचंद्र जी ने लक्ष्मण को छल की बात बताई । दोनों भाई कुटिया में पहुँचे और सीताजी को पुकारने लगे।लेकिन सीताजी कही नहीं मिली। कुटिया के बाहर खोजने पर उन्हें जटायु घायल अवस्था में दिखा, उसने रामजी को बतलाया कि सीताजी को रावण हर के ले गया है।
सीताजी को खोजते हुये राम जी की भेंट हनुमान जी से भेंट हुई। वहीं पर सुग्रीव और रामजी में मित्रता हुआ। रामजी ने सुग्रीव की सहायता की और बालि का वध कर सुग्रीव को उसकी गद्दी लौटायी। सभी वानर ,हनुमान,अंगद और जाम्वंत के साथ सीता जी के खोज में निकल पड़े। हनुमान जी समुद्र लाँघ कर लंका पहुँचे और सीताजी का पता लगाया। लंका में रावण के पुत्र ने हनुमान जी को ब्रह्मास्त्र से बाँधकर सभा में पेश किया। जहाँ पर सभी के विचार से हनुमानजी के पूँछ में आग लगा दी गई। हनुमान जी ने पूरे लंका को अपने पूँछ के आग से जला डाला। हनुमान जी सीताजी का पता लगाकर रामजी के पास पहुँचे।
रामजी ने समुद्र पर पुला बनाकर वानरों सहित लंका पर चढ़ाई कर दी। रामजी और लक्ष्मण जी ने रावण सहित सभी राक्षसों का वध किय।विभीषण को लंका की गद्दी सौंप दी।सीता को लेकर रामचंद्र जी लक्ष्मण सहित अयोध्या पहुँचे।
उसके बाद रामचंद्र जी ने अयोध्या की राजगद्दी सँभाली। अयोध्या में सभी नगरवासी सुखपूर्वक रहने लगे।

सोमवती अमावस्या व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन हिंदी में- हिंदी मास के अनुसार हर मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं ।
Somvati Amavasya vrat vidhi and Katha in Hindi According to Hindi Calender Amavasya falls in every month. But when it comes on Monday it is called Somvati Amavasya.

वट सावित्री व्रत विधि, पूजन सामग्री एवं कथा हिंदी में- ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है।
Vat Savitri Vrat Katha and Pujan Vidhi in Hindi - Vat savitri falls on amavasya tithi of krishna paksha jyeshta month. The woman who did this Vrat has got immortal suhag.


अनंत चतुर्दशी व्रत विधि एवं कथा हिंदी में - अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि की पूजा की जाती है । यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है ।
Anant Chaturdashi Vrat Katha and Vidhi in Hindi- People Worshipped God vishnu on Anant Chaturdashi. It falls on fourth day of Shukla Paksha Bhadra Month.

करवा चौथ व्रत विधि एवं कथा - करवा चौथ का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी उम्र के लिये करती हैं।
Karwa Chauth vrat vidhi and katha in Hindi - Karvaa chauth celebrates on fourth day of waning moon in kaartik month. Married women keep this fast with benediction of her husband long life.

© 2016 - vratkatha.in - All rights reserved

About Contact Disclaimer