सन्तान सप्तमी व्रत
Santan Saptami Vrat

भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत करने का विधान है। इसे मुक्ताभरण व्रत भी कहते हैं। इस व्रत को कुक्कुट मर्कटी व्रत भी कहते हैं। इस व्रत के करने से दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है। यह व्रत करने वाला सभी सुख भोगकर अंत में शिव लोक को प्राप्त करता है। यह व्रत जन्म जन्मांतर के पाप से मोक्ष दिलाता है तथा खण्डित सन्तान पुत्र पौत्रादि की वृद्धि करता है।

पूजा सामग्री-

•शिव-पार्वती की मूर्ति
•वस्त्र
•चंदन
•अक्षत
•धूप
•दीप
•पुंगीफल (बेल)
•नारियल
•घी
•गंगाजल
•कपूर
•जल
•गंडा के लिये रेशम का डोरा
•नैवेद्य (खीर-पूड़ी और गुड़ वाले पुए)

पूजा विधि -

इस व्रत को करनेवाले प्रात:काल उठ जायें।नित्यकर्म कर किसी नदी, तालाब अथवा घर पर हीं स्नान कर लें। उसके बाद नित्य पूजा करें।
मध्याह्न को पूजा गृह को साफ कर गंगाजल से शुद्ध कर लें। रोली अथवा चावल के आटे या गेहू के आटे से चौक (रंगोली) बनायें ।
उस चौक के मध्य चौकी अथवा लकड़ी का पटरा रखें। उस पर वस्त्र बिछायें।
उसके ऊपर शिव पार्वती की मूर्ति स्थापित करें। शिव पार्वती का आवाहन करें।
तत्पश्चात् धूप, दीप, अक्षत, चंदन, पुष्प,फल इत्यादि से पूजन करें । खीर, पूड़ी तथा सात पुए का भोग अर्पित करें।
उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर कहे- “हे देव! जन्म जन्मांतर के पाप से मोक्ष तथा खण्डित सन्तान पुत्र पौत्रादि की वृद्धि के हेतु मैं सन्तान सप्तमी व्रत करके आप का पूजन करता/करती हूँ।”
उसके बाद रेशम के डोरे में सात गाँठ लगाकर गंडा बनायें और शिव जी को अर्पित करें। धूप,दीप,अष्टगंध से गंडे की पूजा करें और कहें:-
“हे प्रभु इस पुत्र-पौत्र-वर्द्धनकारी डोरे को ग्रहण किजिये।”
उसके बाद आरती करें। आरती के बाद हाथ में पुष्प लेकर पुष्पांजलि समर्पित करें। अपने स्थान पर खड़े होकर तीन बार प्रदक्षिणा करें।
दोनों हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करें:- “हे देव! मेरी दी हुई पूजा को स्वीकार करते हुये मेरी बनी-बिगड़ी भूल-चूक माफ किजिये।”
तत्पश्चात गंडे को प्रसाद के रूप में शिवजी के पास से लेकर स्वयं धारण करें। और यह संकल्प करें कि यह जीवन हमने शिवजी को समर्पित किया । ”
उसके बाद कथा सुने।

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