गजेंद्र मोक्ष

आज बहुत से ज्योतिषों, धार्मिक गुरु और कई तरह के अन्य स्त्रोतों से कर्ज से मुक्त होने के लिये गजेंद्र मोक्ष के पाठ को करने का सुझाव दिया जाता है। इसका पाठ करने से पित्तर दोष से मुक्ति मिलती है. जो लोग कर्ज से परेशान हैं और उनके लिये कर्ज चुकाना अत्यंत कठिन हैं उन्हें भी गजेंद्र मोक्ष के पाठ से समस्या का समाधान मिलता है। किसी भी तरह के मुश्किल मे घिरे होने पर हमें इस स्त्रोत का पाठ करना चाहिये। इस के पाठ से शीघ्र हीं कोई न कोई रास्ता मिल जाता है। इस पाठ का आरम्भ शुक्ल पक्ष की किसी भी तिथि को कर सकते हैं। पाठ करते समय आपका मुख पूर्व दिशा की ओर हो। यह पाठ सूर्योदय से पूर्व अर्थात सूर्य निकलने के पहले करने पर अति उत्तम फलदायी होता है।

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत (Gajendra Moksha Strota)

Gajendra Moksha Strota

बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को ह्रदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार-बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन –ही- मन पाठ करने लगा ॥१॥

Gajendra Moksha Strota

गजेन्द्र ने कहा—जिनकेप्रवेश करनेपर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड़ शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भाँति व्यवहार करने लगते हैं) , ‘ओम् ’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीरों में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्वसमर्थ परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ एवं प्रेमपूर्वक उनका ध्यान करता हूँ ॥ २॥

Gajendra Moksha Strota

जिनके सहारे यह संसार टिका है, जिनसे यह उत्पन्न हुआ है, जिनके द्वारा इसकी रचना हुई है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं- फिर भी जो इस दृश्य जगत् से एवं उसकी कारणभूता से सर्वथा परे ( विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन स्वयं प्रकाश, स्वयं सिद्ध भगवानकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३ ॥

Gajendra Moksha Strota

अपनी संकल्प शक्ति के द्वारा अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहनेवाले इस शास्त्र –प्रसिद्ध कार्य- कारणरूप जगत् को जो अकुण्ठित – दृष्टि होने के कारण साक्षीरूप से देखते रहते हैं- उनसे लिप्त नहीं होते , वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥ ४ ॥

Gajendra Moksha Strota

प्रलय के समय सम्पूर्ण लोकों एवं ब्रहादि लोकपालों के पंचभूतों में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी प्रमकारणरूपा प्रकृति में लीन हो जाने पर , उस समय दुर्ज्ञेय तथा गहरा अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परमधाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं , वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥ ५ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिस प्रकार भिन्न-भिन्न रूपों में नाट्य करनेवाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को साधारण दर्शक नहीं जान पाते, उसी प्रकार सत्वप्रधान देवता अथवा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नहीं जानते ,फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें॥ ६॥

Gajendra Moksha Strota

आसक्ति से सर्वथा छूटे हुए ,सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखनेवाले , सबके अकारण हित एवं अतिशय साधु-स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रहकर अखण्ड ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं – वे प्रभु मेरी गति हैं॥ ७ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिनका हमारी तरह न कर्मवश जन्म होता हैं और न जिनके द्वारा अहंकारप्रेरित कर्म हीं होते हैं, फिर उनके सम्बन्ध में गुण और दोष की तो कल्पना ही कैसे की जा सकती है? फिर भी जो समयानुसार जगत् की सृष्टि और प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को अपनी माया से स्वीकार करते हैं॥ ८ ॥

Gajendra Moksha Strota

उन अनन्त शक्ति समप्न्न परब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । वे प्राकृत अरूप होने पर भी अनेकों रूप वाले , अद्भूतकर्मा भगवान को बार-बार नमस्कार है ॥ ९ ॥

Gajendra Moksha Strota

स्वयंप्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है। उन प्रभु को ,जो मन, वाणी एवं चित्तवृतियों से भी सर्वथापरे हैं , बार-बार नमस्कार है ॥ १० ॥

Gajendra Moksha Strota

विवेकी पुरुषके द्वारा सत्वगुणविशिष्ट, निवृति धर्मा के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष-सुखके देनेवाले तथा मोक्ष-सुखकी अनुभूतिरूप प्रभु को नमस्कार है ॥ ११ ॥

Gajendra Moksha Strota

सत्वगुणको स्वीकार करके शांत, रजोगुणको स्वीकार करके घोर एवं तमोगुणको स्वीकार करके मूढ़ से प्रतीत होनेवाले, भेदरहित ; अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥ १२ ॥

Gajendra Moksha Strota

शरीर, इंद्रिय आदि के समुदायरूप सम्पूर्ण पिण्डोंके ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षीरूप आपको नमस्कार है। सबके अन्तर्यामी, प्रकृतिके भी परम कारण, किंतु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥ १३ ॥

Gajendra Moksha Strota

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारणरूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होनेवाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासनेवाले आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

Gajendra Moksha Strota

सबके कारण किंतु स्वयं कारणरहित तथा कारण होने पर भी परिणामरहित होने के कारण अन्य कारनों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है। सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की प्ररम गति भगवान को नमस्कार है । ॥ १५ ॥

Gajendra Moksha Strota

त्रिगुणरूपी ज्ञान को जिन्होंने काष्ठ अरणि में छुपे हुए अग्नि के तरह गुप्त रखा हुआ है। उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मनमेंसृष्टि रचनेकी बाह्य – वृति- जाग्रत हो जाती है तथा आत्मतत्वकी भावना के द्वारा विधि-निषेधरूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित रहते है, उन महाप्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १६ ॥

Gajendra Moksha Strota

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीव की अविद्यारूप फाँसी को सदाके लिये पूर्णरूप से काट देनेवाले अत्यधिक दयालु एवं दया करने में कभी आलस्य न करनेवाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है। अपने अंश से सम्पूर्ण जीवों के मनमें अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहनेवाले सर्वनियन्ता अनंत परमात्मा को नमस्कार है ॥ १७ ॥

Gajendra Moksha Strota

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, सम्पत्ति एवं कुटुम्बियों से आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होनेवाले तथा मुक्त पुरुषों द्वारा अपने हृदयमें निरन्तर चिन्तत ज्ञानस्वरूप, सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥ १८॥

Gajendra Moksha Strota

जिन्हें धर्म, अभिलषित भोग, धन एवं मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं, अपितु जो उन्हें अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं, वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ति से सदा के लिये उबार लें ॥ १९ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिनके अनन्य भक्त- जो वस्तुत: एकमात्र उन भगवान के ही शरण हैं – धर्म, अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नहीं चाहते , अपितु उन्हीं के परम मंगलमय एवं अत्यंत विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनंद के सनुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥ २० ॥

Gajendra Moksha Strota

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादिके भी नियामक, अभक्तों के लिये अप्रकट होनेपर भी भक्तियोंगद्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यंत निकट होनेपर भी माया आवरण के कारण अत्यंत दूर प्रतीत होनेवाले, इंद्रियोंके द्वारा अगम्य तथा अत्यंत दुर्विज्ञेय, अंतरहित किंतु सबके आदि कारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥ २१ ॥

Gajendra Moksha Strota

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा सम्पूर्ण चराचर जीव नाम और आकृतिके भेद से जिनके अत्यंत क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥ २२ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिस प्रकार प्रज्वल्ल्त अग्निसे लपटें तथा सूर्य से किरणें बार-बार निकलती हैं और पुन: अपने कारण में लीन हो जाती है, उसी प्रकार बुद्धि, मन , इंद्रियँ और नाना योनियों के शरी – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयम्प्रकाशपरमात्मा से प्रकट होता है और पुन: उन्हीं में लीन हो जाता है ॥ २३ ॥

Gajendra Moksha Strota

वे भगवान् वास्तव में न तो देवता हैं, न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक् (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनीके प्राणी हैं। न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न नपुंसक हीं हैं। नवे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश न हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बचा रहता है, वही उनका स्वरुप है तथा वे ही सब कुछ हैं। ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥ २४ ॥

Gajendra Moksha Strota

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूटकर जीवित रहना नहीं चाहता ; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओरसे अज्ञानके द्वारा ढ़के हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है। मैं तो आत्माके प्रकाशको ढक देनेवाले उस अज्ञानकी निवृति चाहता हूँ , जिसका कालक्रमसे अपने- आप नाश नहीं होता, अपितु भगवानकी दयासे अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥ २५ ॥

Gajendra Moksha Strota

इस प्रकार मोक्षका अभिलाषी मैं विश्व के रचयिता, स्वयं विश्व के रूपमें प्रकट तथा विश्वसे सर्वथा परे, विश्वको खिलौना बनाकर खेलनेवाले, विश्वमें आत्मारूपसे व्याप्त, अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्तव्य व्स्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूँ- उनकी शरण लेता हूँ ॥ २६ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिन्होंने भगवद्भक्तिरूप योग के द्वारा कर्मोको जला डाला है, वे योगी लोग उसी योगके द्वारा शुद्ध किये हुए अपने ह्रदयमें जिन्हें प्रकट हुआ देखते हैं, उन योगेश्वर भगवान को नमस्कार करता हूँ॥ २७ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्व, रज – तमरूप) शक्तियोंका रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इंद्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे है, तथापि जिनकी इंद्रियाँ विषयोंमें ही रची-पची रहती है – ऐसे लोगोंको जिनका मार्ग भी मिलना असम्भव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपार शक्तिशाली आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २८ ॥

Gajendra Moksha Strota

जिनकी अविद्या नामक शक्तिके कार्यरूप अहंकारसे ढके हुए अपने स्वरूपको यह जीव जान नहीं पाता, उन अपार महिमावाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥ २९॥

Gajendra Moksha Strota

जिसने पूर्वोक्त प्रकारसे भगवानके भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था, उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नहीं आये, जो भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब साक्षात श्री हरि – जो सबके आत्मा होनी के कारण सर्व देवस्वरूप हैं –वहाँ प्रकट हो गये ॥ ३० ॥

Gajendra Moksha Strota

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुखी देखकर तथा उसके द्वारा पढ़ी हुई स्तुति को सुनकर सुदर्शन-चक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेगवाले गरुड़जी की पीठपर सवार हो स्तवन करते हुए देवताओंके साथ तत्काल उस स्थानपर पहुँच गये, जहाँ वह हाथी था ॥ ३१॥

Gajendra Moksha Strota

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकड़े जाकर दुखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड़की पीठ पर चक्र को उठाये हुए भगवान श्रीहरि को देखकर अपनी सूँड़को – जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमलका एक फूल ले रखा था – ऊपर उठाया और बड़ी ही कठिनता से ‘सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है ’ यह वाक्य कहा ॥३२॥

Gajendra Moksha Strota

उसे पीड़ित देख अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड़ को छोड़कर झीलपर उतर आये। वे दयासे प्रेरित हो ग्राह सहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते-देखते चक्र से उस ग्राह का मुँह चीरकर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥

॥ इति गजेंद्र गजेन्द्र मोक्ष ॥



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सोमवती अमावस्या व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन हिंदी में- हिंदी मास के अनुसार हर मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं ।
Somvati Amavasya vrat vidhi and Katha in Hindi According to Hindi Calender Amavasya falls in every month. But when it comes on Monday it is called Somvati Amavasya.

वट सावित्री व्रत विधि, पूजन सामग्री एवं कथा हिंदी में- ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है।
Vat Savitri Vrat Katha and Pujan Vidhi in Hindi - Vat savitri falls on amavasya tithi of krishna paksha jyeshta month. The woman who did this Vrat has got immortal suhag.


अनंत चतुर्दशी व्रत विधि एवं कथा हिंदी में - अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि की पूजा की जाती है । यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है ।
Anant Chaturdashi Vrat Katha and Vidhi in Hindi- People Worshipped God vishnu on Anant Chaturdashi. It falls on fourth day of Shukla Paksha Bhadra Month.

करवा चौथ व्रत विधि एवं कथा - करवा चौथ का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी उम्र के लिये करती हैं।
Karwa Chauth vrat vidhi and katha in Hindi - Karvaa chauth celebrates on fourth day of waning moon in kaartik month. Married women keep this fast with benediction of her husband long life.

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